लार्ड मैकाले की शिक्षा पद्धति से निजात दिलाएगी नई शिक्षा नीति - कुलपति डॉ राजबीर सोलंकी


  Dr.Rajbir Solnki
  02 Aug 2020

केन्द्र सरकार ने नई शिक्षा नीति बनाई जिसको लेकर चौधरी रणबीर सिंह विश्विद्यालय के कुलपति डॉ राजबीर सोलंकी किस नजर से देख रहे हैं ? उनके  द्वारा लिखे गए लेख के माध्यम से समझते हैं। 
केन्द्र सरकार ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अगुआई में देश के भविष्य को सुधारने के लिये देश में नई शिक्षा नीति लागू करने की शुरुआत कर दी है  । देश में किसी सरकार ने पहली बार लार्ड मैकाले द्वारा लागू की गई शिक्षा पद्धति को नकारने की हिम्मत की है ।इससे स्कूल-कॉलेज से लेकर प्राथमिक कक्षा तक की शिक्षा व्यवस्था में बड़े बदलाव किये गये हैं ।  क्योंकि  नई शिक्षा नीति के तहत अब 5वीं कक्षा तक के छात्रों को मातृ भाषा, स्थानीय भाषा और राष्ट्र भाषा में शिक्षा दी जायेगी । अब देश के ननिहालों को उनकी अपनी भाषा में ही पढ़ाया जाएगा।  आज की व्यवस्था में यदि देखा जाये तो हमारे छात्र 4 साल इंजीनियरिंग की पढाई करने के बाद या 6 सेमेस्टर  पढ़ने के बाद यदि अपनी पढाई जारी नहीं रख सकते तो उनके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं रहता । छात्र आउट ऑफ द सिस्टम हो जाता है। नए सिस्टम में ये रहेगा कि एक साल के बाद सर्टिफिकेट, दो साल के बाद डिप्लोमा, तीन या चार साल के बाद डिग्री मिल सकेगी। आर्थिक या अन्य कारण से जो लोग ड्रॉप आउट हो जाते हैं वो वापस सिस्टम में आ सकते हैं। और जिस सेमेस्टर तक पढ़ाई कर चुके थे, उसके आगे अपनी पढाई जारी रख सकेंगे। इसके अलावा जो अलग-अलग विषयों में रूचि रखते हैं, जैसे जो म्यूजिक में रूचि रखते हैं, लेकिन उसके लिए कोई व्यवस्था नहीं रहती है उनको भी मौक़ा मिलेगा । नई शिक्षा नीति में मेजर और माइनर के माध्यम से ये व्यवस्था रहेगी। नई शिक्षा नीति के तहत स्कूली शिक्षा में 10+2 फॉर्मेट को खत्म कर दिया गया है। इसे 10+2 से 5+3+3+4 फॉर्मेट में ढाला गया है। हायर एजुकेशन में भी कई सुधार किए गए हैं। सुधारों में ग्रेडेड अकेडमिक, ऐडमिनिस्ट्रेटिव और फाइनेंशियल ऑटोनॉमी आदि शामिल किये गये हैं। इसके अलावा क्षेत्रीय भाषाओं में ई-कोर्स शुरू किए जाएंगे।वर्चुअल लैब्स विकसित किए जाएंगे।एक नैशनल एजुकेशनल साइंटफिक फोरम (NETF) शुरू किया जाएगा।  आज  देश में लगभग 45 हजार कॉलेज हैं। नए सुधारों में टेक्नॉलॉजी और ऑनलाइन एजुकेशन पर जोर दिया गया है।अभी हमारे यहां डीम्ड यूनविर्सिटी, सेंट्रल यूनिवर्सिटीज और स्टैंडअलोन इंस्टिट्यूशंस के लिए अलग-अलग नियम हैं। नई एजुकेशन पॉलिसी के तहत सभी के लिए नियम समान होंगे। प्राथमिक स्तर पर देखने से काफी सराहनीय कदम नजर आ रहा है। शिक्षा नीति में बदलाव की माँग दशकों से होती आ रही है। इसका सबसे महत्वपूर्ण कारण भारत द्वारा देशवासियों के ऊपर अंधकारमयी पाश्चात्य शिक्षा को थोपना रहा है, जिसका विशेषकर हमारी संस्कृति पर व्यापक स्तर पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है। मुद्दा सिर्फ पाश्चात्य संस्कृति को थोप कर देश की  शिक्षा व्यवस्था को नष्ट करने तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि हमारी शिक्षा व्यवस्था ना सिर्फ अच्छे वैज्ञानिक, इंजीनियर, प्रबंधक, चिकित्सक और अध्यापक तैयार करने में विफल रही है बल्कि अच्छे नागरिकों का औसत उत्पादन करने में भी विफल रही है। चीन, जापान, जर्मनी, फ्रांस, इटली, कोरिया जैसे जितने भी सफल देश है, उनकी अपनी एक खास शिक्षा नीति रही है, वहाँ गणित, कला, विज्ञान की शिक्षा अंग्रेजी के बजाय वहाँ की मूल भाषा में दी जाती रही है। उन्होंने दूसरे देशों का अंधानुकरण नहीं किया है। मूल भाषा में पढ़ी गई चीजों को सीखने, याद रखने में ज्यादा सुविधा रहती है, अँग्रेजी भारत हमारी मूल भाषा नहीं है इसलिए अधिकांश छात्र भाषा के स्तर पर ही उलझे नजर आते हैं। भाषा की कमजोरी सोचने की क्षमता को कम करती है तथा कल्पनाशीलता पर इसका दुष्प्रभाव पड़ता है, आज भी अच्छे से अच्छा अँग्रेजी का भारतीय विद्वान अँग्रेजी में नहीं सोच सकता है, उसे अपने मन के विचारों, कल्पनाओं को इंग्लिश में ट्रांसलेट करना पड़ता है, लेकिन हमारे देश के पहले  प्रधानमंत्री  पाश्चात्य संस्कृति से इतने प्रभावित थे कि वह कभी भारतीय भाषा और संस्कृति के बारे में सोच ही  नहीं पाये । भारतीय सभ्यता और संस्कति के बारे में गहन जानकारी रखने वाले कई विद्वानों का तो यहाँ तक कहना है कि वह हमारी मात्र भाषा से लेकर सस्कृति तक से अंदर खाते नफरत करते थे इसलिए  उन्होंने इस भारतीय संस्कृति को खत्म करना ही अपने जीवन का उदेश्य बना लिया था। स्वाधीनता के पश्चात एक ऐसी शिक्षा व्यवस्था सरलता से स्थापित की जा सकती थी जो अधुनिकता और भारतीय संस्कृति के जड़ों से जुड़े रहने का मिश्रण हो सकता था, लेकिन तत्कालीन भारतीय नेतृत्व ने शिक्षा का पूर्ण पाश्चात्यकरण ही कर दिया। उन्होंने स्वयं को आने वाली पीढ़ियों के समक्ष महान सिद्ध करने के उदेश्य से स्वयं को, अपने से जुड़े लोगों को पाठ्यक्रम में सम्मिलित कराया लेकिन प्राचीन वैदिक परंपराओं, भारतीय चिंतन और भारतीय संस्कृति से भारतीय शिक्षा को वंचित रखा। लगभग सभी राजनीतिक संगठनों में पिछड़ी जातियों और मुस्लिमों की हितैषी बनने की होड़ लगी हुई है। पिछड़ी जातियों, जनजातियों और अल्पसंख्यकों के आर्थिक व सामाजिक पक्ष को मजबूत करने के बजाय उच्च शिक्षण संस्थानों में नामांकन व फैकल्टी के रूप में 70% तक आरक्षित सीटें दे दी गई है। काँमन सेंस की बात है ऐसी स्थिति में इन शिक्षण संस्थानों के गुणवत्ता का स्तर क्या होगा? 
अभी जो नई शिक्षा नीति आई है, इससे भी बहुत जल्दी क्रांतिकारी परिवर्तन आने की आशा तो नहीं कर सकते लेकिन बदलाव होना अवश्यमभावी लग रहा है।भारतीय शिक्षा व्यवस्था को आज जिस बदलाव की जरुरत थी केन्द्र सरकार ने नई शिक्षा नीति लागू करके उसकी पहल कर दी है अब आगे हमारी जिम्मेदारी है कि इसको स्वीकार करके हम जल्दी से जल्दी अंगीकृत करें जिससे कि जल्दी से जल्दी लार्ड मैकाले द्वारा लागू की गई शिक्षा पद्धति से हमें छुटकारा मिल सके।


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