जींद में जीतेगा कौन, क्या हैं समीकरण


  संजय वशिष्ठ
  17 Jan 2019

चुनावी वर्ष में उपचुनाव किसी भी सरकार के लिए चुनौती  होता है लेकिन अन्य प्रतिस्पर्धी दलों के लिए भी जीवन -मरण का प्रश्न बन जाता है . इसी लिए जींद हलके का उपचुनाव सभी राजनीतिक दलों की प्रतिष्ठा से जुड़ गया है
. जो जीतेगा ,वह यक़ीनन बुलंद हौंसलों के साथ आम चुनाव में कूदेगा और जो हारेगा ,उसे पुनः हौंसला पाने के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ेगी . जींद की जंग  का नतीजा निश्चित ही हरियाणा कीई भावी राजनीति की दिशा तय करने में अहम्
भूमिका निभाएगा . 
जींद विधानसभा सीट इंडियन नेशनल लोकदल के खाते में थी ,सो उसकी कोशिश होगी कि जींद पर उसका कब्ज़ा बरकरार रहे लेकिन देवीलाल परिवार के दो हिस्सों में बंटे होने के चलते इनेलो के लिए ऐसा कर पाना टेढ़ी खीर है क्योंकि खुद देवीलाल के प्रपौत्र दिग्विजय चौटाला अपनी नई पार्टी जननायक जनता पार्टी से चुनाव में ताल ठोके हुए हैं. सत्तारूढ़ भाजपा ने इनेलो के दिवंगत विधायक डॉ हरिचंद मिड्डा के पुत्र कृषण मिड्डा को टिकट देकर भी इनेलो के दावे को कमज़ोर किया है .कांग्रेस ने भी अपने स्टार लीडर रणदीप सुरजेवाला को प्रत्याशी घोषित कर एलान कर दिया है कि वह जींद पर काबिज़ होने के लिए किसी भी हद तक जायेगी . इतना ही नहीं ,  राजकुमार सैनी की लोकतंत्र सुरक्षा पार्टी ने भी जाट गढ़ में गैर -जाट की बीन बजाते हुए ब्राह्मण प्रत्याशी मैदान में झोंक दिया है . 
कांग्रेस शुरू में जींद को लेकर दिशाहीन सी थी . उसके कार्यकर्ता भी यह मान रहे थे कि उपचुनाव में हांसिल करने के लिए उनके पास कुछ विशेष नहीं है लेकिन पार्टी ने अंतिम क्षणों में कद्दावर नेता रणदीप सुरजेवाला को मैदान में उतार कर एक तरह से यह ऐलान कर दिया कि जींद को लेकर वह नींद में नहीं है . सुरजेवाला की नामजदगी ने न सिर्फ कांग्रेस कार्यकर्ताओं की रगों में खून का दौरा तेज कर दिया बल्कि विरोधी भी तंद्रा से बाहर आ गए. राहुल गाँधी के निर्देश पर जिस तरह कांग्रेस के गुटीय नेता रणदीप के लिए एकजुट हुए ,उससे भी यही सन्देश गया कि कांग्रेस जींद को लेकर बेहद गंभीर है . भूपेंदर हुड्डा , अशोक तंवर ,सेलजा ,किरण चौधरी ,कुलदीप बिश्नोई और
अजय यादव का एक साथ दिखना कांग्रेस कार्यकर्ताओं में प्राण फूंकने के लिए
काफी था .

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में आज़ादी के सात दशक बाद भी 'जाति' ही चुनाव में जीत -हार का निर्णय करती है , इस धरातलीय सत्य को खारिज नहीं किया जा सकता . सो , जींद में भी तमाम राजनीतिक विश्लेषक जातिगत आंकड़ों की रौशनी में ही प्रत्याशियों की संभावनाओं का आकलन कर रहे हैं . चुनाव के वास्तविक मुद्दे कहीं बहुत पीछे छूट गए हैं . सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी , जिस पर समूचे हरियाणवी समाज को जाट व  गैर -जाट में बांटने का आरोप है ,ने चुनाव में पंजाबी प्रत्याशी उतार कर अपने ऊपर लगे आरोप को ही पुख्ता किया है लेकिन उसे इसका कोई अफ़सोस भी नहीं है क्योंकि अंततः गैर-जाट की राजनीति व रणनीति  ही उसके भाग्य का निर्धारण करेगी .दूसरी ओर ,कांग्रेस ,जजपा व इनेलो ने जाट उम्मीदवार मैदान में उतार कर पूरे चुनाव को जाट -गैर जाट   रंग में रंग दिया है . 
जींद में जातियों की महाभारत तय है . देखना रोचक होगा कि किस तरह की सोशल
इंजीनियरिंग धरातल पर आकार लेती है . इस हलके में जाट मतदाताओं की संख्या
सबसे ज्यादा है . करीब -करीब एक चौथाई जाट आबादी  अपने तीन उम्मीदवारों में से खुद किसके पक्ष में निर्णय लेगी ,यह भी जिज्ञासा का विषय है . साथ ही ,यह भी महत्वपूर्ण है कि किस जाट प्रत्याशी को बड़े पैमाने पर दलित व् पिछड़ी जातियों का समर्थन मिलता है . असल में किसी भी जाट प्रत्याशी की विजय उसके दूसरे सामाजिक मित्र ही तय करेंगें. ये भी संभव है कि ये सामाजिक तबके भाजपा के पक्ष में चले जाएँ.  चुनावी परिणाम की वास्तविक कुंजी इन्हीं वर्गों के पास है .


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