राम रिछपाल से यूँ ही नहीं बन गए सबके राम छोटूराम


  alakh haryana
  24 Nov 2020

अलख हरियाणा || 
मुसलमानों के रहबर-ए-आज़म और हिन्दुओं के दीनबंधु सर छोटूराम के बारे आप ये जानते ही होंगे कि उनका जन्म जन्म 24 नवम्बर 1881 में झज्जर के छोटे से गाँव गढ़ी सांपला में बहुत ही साधारण किसान परिवार में हुआ था। उस वक्त रोहतक पंजाब सूबे का हिस्सा हुआ करता था।  असल नाम तो  राम रिछपाल था लेकिन परिवार में सबसे छोटा होने  की वजह से उनको सब छोटू ही बुलाते थे।  राम रिछपाल से छोटूराम बनने की पीछे उनका तप ही था कि उन्होंने किसान तबका आज भी उन्हें अपना राम मानता है।  

बतौर वकील छोटूराम ने अपने नियम बनाकर पीड़ितों  की मदद करने का काम किया। वे  झूठे मुकदमे नहीं लेते थे।  गरीबों को निःशुल्क कानूनी सलाह देते थे।  
मुव्वकिलों के साथ सद्‍व्यवहार करते थे।  उनके ऐसे आदर्श सिद्धांतों ने वकालती जीवन को अलग राह दी। कोर्ट में किसान मजदूरों की मदद के आलावा उन्होंने 
साल 1915 में ‘जाट-गजट’ नामक अख़बार के जरिये उन्होंने ग्रामीण जनजीवन का उत्थान और साहूकारों द्वारा गरीब किसानों के शोषण पर क्रांतिकारी लेख लिखे। पुरे मुल्क में उनकी शख़्सियत के चर्चे आम थे।  साल 1937 में पंजाब के प्रोवेंशियल असेंबली चुनावों में उनकी पार्टी को जीत मिली और वे विकास व राजस्व मंत्री बन गए। इसके बाद लोग उन्हें ‘राव बहादुर’ कहने लगे।
आवाम के दरमियान  उनके बढ़ते कद को देख, एक बार रोहतक के ब्रिटिश डिप्टी कमिश्नर ने अंग्रेजी सरकार से सर छोटूराम को देश-निकाला देने का प्रस्ताव दिया। इस प्रस्ताव पर जब चर्चा हुई तो एक भी आवाज़ डिप्टी कमिश्नर के पक्ष में नहीं आई। तत्कालीन पंजाब सरकार ने अंग्रेज हुक्मरानों को बताया कि चौधरी छोटू राम अपने आप में एक क्रांति हैं। अगर उन्हें देश निकाला मिला तो फिर से देश में क्रांति होगी और इस बार हर एक किसान चौधरी छोटूराम बन जायेगा। सर छोटूराम के देश-निकाले की बात तो रद्द हो ही गयी पर साथ में उस कमिश्नर को उनसे माफ़ी भी मांगनी पड़ी।

किसानों के लिए बनवाए कई कानून

छोटूराम ने किसानों के लिए कई महत्वपूर्ण काम किए. उनके इन कामों को अब भी किसानों के लिए मील का पत्थर माना जा सकता है.
# कर्जा माफी ऐक्ट 1934 (8 अप्रैल 1935)
इसके तहत अगर कर्ज के पैसे का दोगुना पैसा दिया जा चुका हो तो कर्ज माफ हो जाता था. दुधारू पशुओं की नीलामी पर भी रोक लग गई थी.

# साहूकार पंजीकरण ऐक्ट – 1938 (2 सितंबर 1938)
इसके तहत कोई भी साहूकार बिना रजिस्ट्रेशन के किसी को भी कर्ज नहीं दे सकता था और न ही कोर्ट में केस कर सकता था.

# गिरवी जमीनों की मुफ्त वापसी ऐक्ट 1938 (9 सितंबर 1938)
इस कानून के तहत 8 जून 1901 के बाद कुर्क हुई जमीनों को किसानों को वापस दिलवाया गया.

# कृषि उत्पाद मंडी ऐक्ट 1938 (5 मई 1939)
छोटूराम ने मार्केट कमिटियों को भी बनाया, जिससे किसानों को उनकी फसल का अच्छा पैसा मिलने लगा. आढ़तियों के शोषण से मुक्ति मिल गई.

 # व्यवसाय श्रमिक ऐक्ट 1940 (11 जून 1940)
इस कानून के तहत मज़दूरों को सप्‍ताह में 61 घंटे और एक दिन में 11 घंटे से ज्यादा काम नहीं लिया जा सकता था. इसके अलावा साल में 14 छुट्टियां और 14 साल से कम उम्र के बच्चों से मजदूरी नहीं कराए जाने का भी नियम बना था.




मोर का शिकार करते थे अंग्रेज, मारने पर लगवा दिया प्रतिबंध

गोरों के राज में गुड़गांव जिले के अंग्रेज डिप्टी कमिश्नर कर्नल इलियस्टर मोर का शिकार करते थे।  लोगों के लाख विरोध के बाद भी कर्नल इलियस्टर के कानों पर कोई जूं  नहीं रेंगती थी।  इसकी खबर लोगों ने छोटूराम को दी।  उस  अंग्रेज अफसर के खिलाफ अपने अख़बार में इतना लिखा कि कर्नल इलियस्टर ने माफी मांगनी  पड़ी।  और उसके बाद से ही भारत में मोरों की हत्या पर रोक लग गई। 

एक ऐसा किस्सा भी आम है कि कर्जा माफी अधिनियम न केवल किसानों के लिए था बल्कि लाहौर हाईकोर्ट के एक जज को किसानों के मसीहा का जवाब था। दरअसल, एक बार कर्जें में डूबे किसान ने लाहौर हाईकोर्ट में मुख्य न्यायाधीश से कहा कि वह बहुत गरीब है और इसलिए अगर हो सके तो उसकी सम्पत्ति की नीलामी न की जाये। तब न्यायाधीश ने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा कि  छोटूराम नाम का आदमी है, वही ऐसे कानून बनाता है, उसके पास जाओ और कानून बनवा कर लाओ।वह किसान बड़ी आस लेकर छोटूराम के पास आया और यह बात सुनाई । सर छोटू राम ने कानून में ऐसा संशोधन करवाया कि उस अदालत की सुनवाई पर ही प्रतिबंध लगा दिया गया।भाखड़ा-नंगल बांध भी सर छोटूराम की ही देन है। उन्होंने ही भाखड़ा बांध का प्रस्ताव रखा था पर सतलुज के पानी पर बिलासपुर के राजा का अधिकार था। तब सर छोटूराम ने ही बिलासपुर के राजा के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किए। बाद में उनके इस प्रोजेक्ट को बाबा साहेब अम्बेडकर ने आगे बढ़ाया।

“मैं राजा-नवाबों और हिन्दुस्तान की सभी प्रकार की सरकारों को कहता हूँ, कि वो किसान को इस कद्र तंग न करें कि वह उठ खड़ा हो….  दूसरे लोग जब सरकार से नाराज़ होते हैं तो कानून तोड़ते हैं, पर किसान जब नाराज़ होगा तो कानून ही नहीं तोड़ेगा, सरकार की पीठ भी तोड़ेगा।”

‘ए भोले किसान, मेरी दो बात मान ले- एक बोलना सीख और एक दुश्मन को पहचान ले’

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