कुलपति पद की प्रतिष्ठा तो जरूर धूमिल हुई है


  Dr.Satish Tyagi
  03 Jan 2017

कल की खबर है कि  महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय में आयोजित उत्तर क्षेत्रीय अंतर विश्वविद्यालय महिला कबड्डी प्रतियोगिता का शुभारम्भ मुख्यमंत्री के निजी सचिव ने किया | एक व्यक्ति के रूप में निजी सचिव का कोई विरोध नहीं हो सकता और न ही उसे अपमानित किया जा सकता है लेकिन निजी सचिव पद को लेकर तो चर्चा होनी ही चाहिए | आखिर ,ऐसी क्या विवशता थी कि इस स्तर के कार्यक्रम में मुख्यमंत्री के निजी सचिव को आमंत्रित किया गया और न केवल आमंत्रित किया गया अपितु कार्यक्रम में उपस्थित कुलपति ने राज्य सरकार व निजी सचिव का प्रशस्तिगान भी किया |मुझे याद नहीं पड़ता कि अब से पहले कभी इस तरह की घटना हुई हो |जो कुछ हुआ उससे निजी सचिव पर तो कोई प्रभाव नहीं पड़ता लेकिन कुलपति पद की प्रतिष्ठा तो जरूर धूमिल हुई है |
कुलपति पद पर नियुक्ति पाना कोई आसान प्राप्ति नहीं है | एक पूरी प्रक्रिया के बाद ही इस पद पर योग्यतम व्यक्ति का चयन होता है | आदर्श स्थिति यह है कि कुलपति की नियुक्ति में सरकार का दखल न हो लेकिन सच यह
है कि राज्य के विश्व विद्यालयों में कुलपतियों की नियुक्तियां मुख्यमंत्री ही करते हैं , हाँ नियुक्ति से पूर्व तमाम तरह की
औपचारिकताएं पूरी करने की औपचारिकता निभा ली जाती है |ऐसे में जिस दल की सरकार राज्य में होती है ,अनिवार्य रूप से कुलपति भी उसी दल के समर्थक होते हैं और जैसे ही सत्ता परिवर्तन होता है तो कुलपति भी बदल दिए जाते
हैं | सत्ता परिवर्तन के समय यदि किसी कुलपति का कार्यकाल पूरा न हुआ हो तो वह कुलपति या तो सत्तधारी दल के समक्ष समपर्ण कर देता है या तरह -तरह की यातनाएं झेलना उसकी नियति हो जाति है | एक विकल्प यह भी होता है कि समायोजित न हो सकने वाला कुलपति त्यागपत्र देकर चला जाए | यदि हम अपने देश के कुलपतियों की तुलना विकसित पश्चिमी अथवा एशिया के भी मुल्कों से करें तो हमारे कुलपति बंधुआ मजदूर से ही दिखते हैं | देखें कि
असल में कुलपति क्या होता है और उससे क्या अपेक्षाएं की जाती हैं | विश्वविद्यालय का प्रशासनिक मुखिया कुलपति यानी वाइस चांसलर है। राज्यपाल या उपराज्यपाल और राष्ट्रपति जैसे संवैधानिक पदों का कुलाधिपति होना इस
तथ्य को प्रमाणित करता है कि यह पद स्वायत्ता को अपने में समेटे है और इस  स्वायत्ता का स्तर  कमोबेश न्यायपालिका की स्वायत्तता जैसा है। अदालतों की तरह विश्वविद्यालयों को भी राजनीतिक सत्ता से दूर रखने के लिए
स्वायत्तता के सिद्धान्त की संकल्पना हुई थी| विश्वविद्यालयको पठन-पाठन के अलावा परीक्षाओं का संचालन और तमाम प्रशासनिक कार्य करते होते हैं।जो रजिस्ट्रार, डीन और परीक्षा-नियंत्रक जैसे लोग करते हैं। इनमें से डीन,बरसर और वार्डन वग़ैरह को अध्ययन-अध्यापन के अलावा छात्रों और प्रशासन के बीच सेतु की भूमिका भी निभानी होती है।
स्वभाव से ही विश्वविद्यालय जीवन्त प्रकृति के होते हैं। हर साल वहाँ नये छात्र-छात्राओं के रूप में विलक्षण प्रतिभाएँ दाखिला लेती हैं। कितने ही विद्यार्थी ख़ुद को निखार-संवारकर वहाँ से विदा लेते हैं और जीवन में विभिन्न क्षेत्रों में नयी भूमिकाओं के साथ दाखिल होते हैं। ये ख़ूबसूरत सिलसिला लगातार चलता है। वैसे तो ये हाल हरेक शिक्षण संस्थान का होता है। लेकिन स्कूल-कालेज़ में जहाँ विद्यार्थी अपेक्षाकृत अबोध और अपरिपक्व होते हैं, वहीं विश्वविद्यालय स्तर तक पहुँचते-पहुँचते उनमें परिपक्वता आने लगती है। विश्वविद्यालय प्रवास के दौरान कितनी ही बार तमाम धारणाओं के बारे में उनकी धारणाएँ बदलती हैं। इसीलिए, विश्वविद्यालयी जीवन में स्वछंदता और स्वायत्तता की ज़रूरत महसूस की गयी है।इस संकल्पना को हमारे विश्वविद्यालय कितना प्रदर्शित करते हैं ,इसका निर्णय आप कीजिये |


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