RSS के हिडन एजेंडे पर काम कर रहे खट्टर साहब-गीता भूक्कल


  DR.SATISH TYAGI
  04 Dec 2017

हिंदुस्तान में महिलाओं के लिए, राजनीति करना कभी आसान नहीं रहा। यहाँ ‘राजनीतिक पुरुष’ के लाभ ‘राजनीतिक महिला’ को नहीं मिलते। हरियाणा में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी कभी भी उत्साहजनक नहीं रही और इसलिए प्रभावी भी नहीं। राज्य के रूप में अस्तित्व में आने के पचास साल बाद भी में यह कल्पना नहीं की जा सकती कि तथाकथित विकसित व प्रगतिशील हरियाणा की कमान कोई महिला संभाले! दूसरी ओर , कथित रूप से ‘बीमारू’ राज्यों यथा -उत्तरप्रदेश, बिहार , ओड़िसा , राजस्थान व मध्यप्रदेश और पड़ोसी राज्य पंजाब में भी महिलायें प्रदेश सरकारों की मुखिया रह चुकीं हैं। हरियाणा में साठ के दशक में ओमप्रभा जैन और हाल ही के वर्षों में कुमारी सैलजा का नाम तो मुख्यमंत्री पद के लिए चला लेकिन बस चलकर रह गया। हैरत की बात तो यह है कि एक अपवाद (चन्द्रावती) को छोड़कर कभी किसी भी दल ने अपने संगठन तक की कमान महिला के हाथों में नहीं दीद्य पिछले दिनों कांग्रेस कांग्रेस में प्रदेश अध्यक्ष पद के लिए दो महिलाओं कुमारी सैलजा व गीता भुक्कल के नाम सियासी हवाओं में तैरे हैं। सैलजा सार्वजनिक रूप से ऐसी किसी संभावना से इनकार कर चुकी हैं। देखना होगा कि गीता भुक्कल के नाम की चर्चा की क्या परिणिति होती है भुक्कल लगातार तीन बार विधान सभा चुनाव जीत चुकीं हैं,पहली दफा कलायत से और दो बार झज्जर से।  अलख हरियाणा के संपादक डाॅ सतीश त्यागी ने उनकी दावेदारी व अन्य मुद्दों पर गीता भुक्कल से विस्तृत बातचीत की ? प्रस्तुत हैं बातचीत के अंश ..
प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष पद के लिए हुड्डा गुट से आपके नाम की भी चर्चा है ? कितना दम है इस चर्चा में ?
 मैं भी मीडिया में ही इस तरह की चर्चा सुनती-पढ़ती हूँ.प्रदेश अध्यक्ष कौन होगा इसका अंतिम निर्णय कांग्रेस आलाकमान ने लेना है। हाँ ,लाखों कांग्रेस कार्यकर्ताओं की तरह मेरी यह अभिलाषा भी है और राष्ट्रीय नेतृत्व से पुरजोर मांग भी कि प्रदेश कांग्रेस की कमान चैधरी भूपेंदर सिंह हुड्डा को सौंपी जाए।
मौजूदा अध्यक्ष अशोक तंवर क्या अपने काम को ठीक से अंजाम नहीं दे रहें हैं ? आप क्यों चाहती हैं कि उन्हें हटाया जाए ?
हरेक व्यक्ति का अपना काम करने का तरीका होता है लेकिन तंवर अपेक्षित परिणाम नहीं दे पा रहें हैं। कांग्रेस कार्यकर्ताओं के बहुमत में वे वह जोश नहीं भर पा रहें है, जो समय व परिस्थितियों की मांग है। नेतृत्व यदि कार्यकर्ताओं की इच्छाओं और भावनाओं के अनुरूप नहीं होगा तो निश्चित ही उनमें उदासीनता बढ़ेगी। दूसरी ओर , हुड्डा साहब की जनसभाओं में अभूतपूर्व संख्या में लोग आ रहें हंै, जो साबित करता है कि न केवल कांग्रेस कार्यकर्ता बल्कि आम जनता भी उम्मीदों भरी नजरों से केवल भूपेंदर सिंह हुड्डा की ओर देख रही है । चाहे किसान-मजदूर पंचायतें रहीं हों या छात्र पंचायतें ,उनकी भारी सफलता से कार्यकर्ताओं व जनता का रुख आसानी से देखा-समझा जा सकता है । इसलिए कांग्रेस के व्यापक हित में यह जरूरी है कि कांग्रेस का नेतृत्व हुड्डा साहब सरीखे बड़े व व्यापक जनाधार वाले नेता के हाथों में दिया जाए। भूपेंद्र सिंह हुड्डा जब मुख्यमंत्री थे तब अशोक तंवर का हर स्तर पर साथ देते थे। आज पार्टी सत्ता में नहीं है तो अशोक तंवर अब मुख्यमंत्री के सपने देखने लगे हैं। उनसे पूछा जाना चाहिए कि वह आखिर चुनाव कहां से लड़ेंगे? उनका हरियाणा में कुछ भी नहीं था। राहुल जी के आदेश पर लोकसभा की सीट पर हुड्डा साहब के सहयोग से उनको जितवाया था। पार्टी अध्यक्ष बनाने में भी हुड्डा साहब ने सहयोग किया लेकिन अशोक तंवर अपनी भूमिका को अच्छे से निभा नहीं सके।
 लेकिन क्या कोई भी दल एक व्यक्ति विशेष पर निर्भर रह सकता है और वह भी तब जबकि इस तरह की चर्चाएं चल रहीं हों कि हुड्डा कांग्रेस छोड़कर नया दल बना सकते हैं ?
हुड्डा साहब के कांग्रेस छोड़ने और नए दल बनाने की अफवाहें जो लोग फैला रहें हैं, उन्हें भविष्य में निराश होना पड़ेगा क्योंकि हुड्डा साहब कांग्रेस छोड़ने की कल्पना भी नहीं कर सकते। उनका कांग्रेस से रिश्ता, कांग्रेस के जन्म के साथ से है। समूचे देश में कोई दूसरा परिवार शायद ही होगा जिसकी चैथी पीढ़ी कांग्रेस के लिए समर्पित है। हुड्डा साहब ने बार-बार कहा है कि दो तरह के कांग्रेसी हैं, एक वे जो कांग्रेस में हैं और दूसरे वे जिनमें कांग्रेस है। कांग्रेस हुड्डा साहब के रक्त में है।
लेकिन बुरी तरह से अंतर्कलह से ग्रस्त कांग्रेस कैसे भाजपा का मुकाबला करेगी ?
लोकतान्त्रिक व्यवस्था में काम कर रहे दलों में अंतर्कलह एक अनिवार्य तत्व है क्योंकि लोकतंत्र में विभिन्न मुद्दों पर अलग-अलग राय रखना स्वाभाविक है। इससे चुनावी संभावनाएं प्रभावित नहीं होतीं। कांग्रेस का इतिहास देख लीजिये, वह कभी अंतर्कलह के चलते नहीं हारी। वैचारिक स्तर पर भिन्नता होते हुए भी कांग्रेस के नेता व कार्यकर्ता कभी ऐसा कुछ नहीं करते जिससे पार्टी कमजोर हो। जहाँ तक भाजपा की बात है, मनोहर लाल खट्टर सरकार के तीन साल के कार्यकाल में सिर्फ विफलताएं दर्ज हैं। भाजपा के तीन साल के कुशासन में हरियाणा विकास की दृष्टि से बीस साल पीछे चला गया है। ऐसे में भाजपा न तो राज्य में कोई राजनीतिक शक्ति है और न ही हमारे लिए कोई चुनौती।
क्या आपको नहीं लगता कि हुड्डा साहब ने तंवर के खिलाफ आपका चेहरा मोहरे के रूप में इस्तेमाल किया ताकि दलित के खिलाफ दलित को खड़ा करके उनका मकसद सध सके ?
जब आप एक्टिव पॉलिटिक्स में है तो आपको चेहरा और मोहरा बनते रहना चाहिए जहां तक हरियाणा कांग्रेस अध्यक्ष की बात है तो मैं इतना कहूंगी की अध्यक्ष, अध्यक्ष होता है वह किसी जाति धर्म क्षेत्र का नहीं होता वह सिर्फ दलित-दलित कह कर एक दायरे  में बंध गए हैं। अशोक तंवर की दिक्कत यह है कि वह अपने से ऊपर, अपने से आगे किसी को नहीं देखना चाहते, जिसके चलते पार्टी को नुकसान हो रहा है. बतौर पार्टी अध्यक्ष अशोक तवर डीसीसी बीसीसी के मेंबर भी नहीं बना सके। पिछले चुनाव में अगर हम पार्टी अध्यक्ष के भरोसे रह जाते तो हमें नुकसान उठाना पड़ता चुनाव में किसी प्रकार की फाइनैंशल स्पोर्ट्स नहीं की .अध्यक्ष को अपनी जिम्मेदारी निभानी चाहिए अब उनका कार्यकाल खत्म हो रहा है, चुनाव  तो होंगे ही।
 
भाजपा का तो दावा है कि उसके विकास व सुशासन ने कांग्रेस को राज्य में शून्य कर दिया है और अगली सरकार भी भाजपा की ही बनेगी ?
भाजपा यदि सुखद भ्रान्ति में जीना चाहती है तो इसके लिए वह स्वतंत्र है लेकिन सत्य यह है कि हरियाणा के इतिहास में इतनी निकम्मी व दिशाहीन सरकार जनता पहली बार देख रही है.सच कहें तो आज की व्यवस्था को सरकार कहते हुए भी संकोच होता है। सूबे की जनता भाजपा को सबक सिखाने के लिए बेसब्री से इंतजार कर रही है। जिस सरकार के कार्यकाल में हरियाणा ने तीन बार विनाश की विभीषिका देखी हो,उसकी पुनरावृति कम से कम हरियाणा के समझदार लोग तो कतई नहीं चाहेंगे। असल में सरकार ऐसे लोगों की बन गई जिन्हें उम्मीद नहीं थी कि उनकी सरकार बनेगी। लोगों को नरेंद्र मोदी का बोलना अच्छा लगा जिसके चलते लोगों ने ऐसे लोगों को वोट दे दिया. नौसिखिए लोगों की सरकार बन गई. मुख्यमंत्री खुद कहते रहे कि मैं नया हूं और मैं सीख जाऊंगा. सांसद राजकुमार सैनी कहते हैं कि हरियाणा के मुख्यमंत्री राजनीति  के स्कूल में नर्सरी की ट्रेनिंग ले रहे हैं। हमारा मानना है कि 3 वर्ष में तो कोई व्यक्ति पीएचडी भी कर लेता है। सीखने के लिए कुछ वक्त तो चाहिए होता है लेकिन उम्र नहीं।
लेकिन कुछ मंत्री व विधायक तो पुराने और अनुभवी भी हैं ?
मंत्रियों और मुख्यमंत्री के बीच समन्वय का अभाव है। अनिल विज सोचते हैं की वह काफी सीनियर हैं लेकिन पहली बार विधायक बने खट्टर मुख्यमंत्री बना दिए गए। यही समस्या रामबिलास शर्मा जी की है कि उनकी वरिष्ठता और अनुभव को दरकिनार कर मनोहर लाल जी को कमान दे दी गयी। अन्य कई मंत्री भी  खट्टर साहब को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर देखकर खुश नहीं हैं। इन चीजों से सरकार का कामकाज प्रभावित होता है। हमारी ऑब्जरवेशन है की सरकार आपस में ही खुद को कमजोर करने में लगी है। सरकार के चुने हुए नुमाइंदों में ही कोआर्डिनेशन की कमी है तो प्रदेश में कोआर्डिनेशन कैसे नजर आएगा सरकार के विधायक सरकार से नाराज हैं वह कहते हैं कि उनकी सरकार में कोई सुनवाई नहीं होती, मंत्री कहते हैं विधायकों के हाथ में पर्ची नहीं होनी चाहिए। ऐसे में केवल सीएम विंडो खोलने से लोगों की समस्याओं का निदान नहीं हो सकता। यदि  आमने-सामने बैठने से काम नहीं हो रहे तो सीएम विंडो खोलने से कैसे काम हो जायेंगे। हरियाणा के नौकरशाह दिशाहीन हो गए हैं। प्रशासनिक अधिकारियों के बार-बार तबादलों से प्रशासन एक तरह से ठप्प हो चुका है। अधिकारीयों को हमेशा अपने तबादले की आशंका बनी रहती है।
क्या किसी भी मोर्चे पर भाजपा सरकार की कोई उपलब्धि नहीं है ?
भाजपा ने अपने चुनावी घोषणा-पत्र में 154 वादे किए थे लेकिन वादों को जुमला कहकर अब पल्ला झाड लिया।  बुजुर्गों की पेंशन बनाने की जगह, आधार से लिंक न होने के कारण बंद करने का काम किया। हरियाणा के कृषि मंत्री ओपी धनखड़ कांग्रेस के वक्त में अर्धनग्न होकर प्रोटेस्ट करते थे कि हरियाणा में उनकी सरकार बनने के बाद स्वामीनाथन रिपोर्ट लागू करवाएंगे लेकिन आज यह लोग एफिडेविट देते हैं। हरियाणा सरकार ने किसानों के हित के लिए जो बहु-प्रचारित  बीमा योजना शुरू की, उसमें किसानों का हित कम और कंपनियों का हित ज्यादा दिखता है। किसानों के सहमति बिना खेती का बीमा करवाया जा रहा है. किसान के खातों से बिना सहमति के बीमा के लिए किश्तें काटकर बीमे किए गए। उनकी फसल जल जाने के बाद कंपनी से बीमा मांगने की जब बात आई तो कंपनी ने कहा एकल किसान को बीमे का सीधा फायदा नहीं मिल सकता इसके लिए एक यूनिट का 70 फीसदी नुकसान होना जरूरी है अन्यथा बीमे की राशि किसानों को नहीं मिल सकती। करोड़ों रुपए का  नुक्सान पहुंचाने का काम भाजपा ने किया जिसका विरोध किसानों से लेकर विपक्ष तक ने किया लेकिन सरकार इस खामी को सुधारने की जगह कंपनियों का फायदा पहुंचाने में लगी रही। भाजपा सिर्फ हमारी सरकार के वक्त की नीतियों के नाम बदलने का काम कर रही है हमारे वक्त में प्रियदर्शनी विवाह शगुन योजना चल रही थी उसकी जगह मुख्यमंत्री विवाह शगुन योजना कर दिया इन का एकमात्र एजेंडा है कि गांधी परिवार के नाम को खत्म करना है।
और सबका साथ ,सबका विकास ....?
मनोहर सरकार का नारा है सबका साथ सबका विकास लेकिन आरटीआई से मिले आंकड़ों के अनुसार यह नारा सिर्फ नारा ही दिखाई देता है। आरटीआई से पता लगा कि 12 जिलों में 1 इंच भी सड़क का निर्माण नहीं किया गया। अगर झज्जर की बात करूं तो यहां सवा किलोमीटर भी सड़क नहीं बनी है। सरकार सिर्फ इन 3 वर्षों से यह कहने पर लगी रही कि वे कांग्रेस के वक्त के गड्ढे भर रहे हैं... जहां भी विपक्ष के विधायक हैं उस विधानसभा क्षेत्र के लिए कोई फंड नहीं दिया गया। जो काम अधूरे थे वह आज भी अधूरे हैं। नेशनल प्लानिंग बोर्ड ने कहा है कि हरियाणा में सड़कें ओवर ड्राफ्ट हो गई है, हम एक भी पैसा नहीं भेजेंगे केवल नाबार्ड से कुछ अप्रूव की गई है... आपने अपना एयरपोर्ट भी जाने दिया, रेलवे कोच को भी जाने दिया। मैं पूछती हूँ कि मुख्यमंत्री जी आप अपने अधिकार को सुरक्षित क्यों नहीं करते। हरियाणा सरकार एक ऐसे प्रोजेक्ट का नाम बता दे जिसे  उसने भारत सरकार से अप्रूव करवाया हो और जिसका काम हरियाणा मैं शुरू हुआ हो।
 
आप शिक्षा मंत्री रहीं हैं। आपकी दृष्टि में भाजपा के शासनकाल में शिक्षा विभाग कैसा चल रहा है.सरकार शिक्षकों के ऑन लाइन तबादला नीति को बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश कर रही है। क्या सचमुच यह ऐतिहासिक काम हुआ है?
शिक्षा विभाग में आज सबसे ज्यादा असंतोष है। चाहे गेस्ट टीचर्स हों या कम्पूटर टीचर्स अथवा नियमित शिक्षक विभिन्न कारणों से परेशान हैं, यदि शिक्षक यह निगरानी करेंगे कि लोग खुले में शौच न करें और किसान पराली न जलाएं,तो सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि शिक्षा के प्रति सरकार का क्या रवैया है। जहाँ तक ऑन लाइन ट्रांस्फार्स की बात है तो खुद शिक्षा मंत्री ही इससे सबसे ज्यादा दुखी हैं। दूसरी तरफ ,राइट टू एजुकेशन हमारे वक्त आया। हमारे वक्त में एजुकेशन इंस्टिट्यूट काफी खोले गए. शिक्षण संस्थानों में भर्ती भी हमने काफी की। मौजूदा सरकार ने टीचर्स भर्ती कितने की है, सब आपके सामने है। इस सरकार ने तो हमारे वक्त में भर्ती हुए लोगों को निकालने का काम किया है एजुकेशन इंस्टिट्यूट में स्टेट कमीशन फॉर चाइल्ड राइट का गठन नेशनल कमीशन के तौर पर हुआ हुआ है।  प्रदेश में छेड़खानी के चलते लड़कियां स्कूल नहीं जा रही है। स्कूल अपग्रेड करवाने के लिए धरने दे रही है। स्कूल खोलने की जगह उनको मर्ज करने में, उनको बंद करने में लगी है अगर बात झज्जर की करो तो 3 साल में सिर्फ एक स्कूल को अब ग्रेड किया गया है।
 
 यह भी आरोप लग रहें हैं कि सरकार शिक्षा का भगवाकरण कर रही है और विश्वविद्यालयों में उच्च पदों पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रष्ठभूमि के लोगों को समायोजित किया जा रहा है ?
पूरी सरकार ही गाय ,गीता और सरस्वती नदी की खोज तक सीमित है संस्कार- शिक्षा के नाम पर एक तरह से भगवाकरण का ही प्रयास है। इतना ही नहीं ,सामान्य प्रशासन में भी संघ प्रष्ठभूमि के लोगों को लाया जा रहा है। मैंने विधानसभा में एक प्रश्न लगाया था जब हमारे पास मंत्री हैं, अधिकारी हैं तो फिर प्रशासन सहयोगियों की क्या आवश्यकता है। इनको किस मद से तनख्वाह दी जाएगी, इनकी योग्यता क्या है तो मुख्यमंत्री ने ऑन रिकॉर्ड कहां था कि अपने सहयोग के लिए हमें प्रशासन सहयोगियों की जरूरत लगी, इसीलिए को लगाया गया है फिर मैंने पूछा था की आपको अधिकारियों पर एतबार नहीं है क्या। उसके बाद चर्चा दूसरे विषय पर होने लगी लेकिन मैंने फिर दोबारा से उनसे पूछा की सब लोग कह रहे हैं अपने अधिकारियों के ऊपर सुशासन सहयोगी के नाम पर संघ के लोगों को बिठा दिया है। मुख्यमंत्री ने कहा कि मैं आर एस एस का हूं और उसी के एजेंडे पर काम कर रहा हूं और हाँ , हम संघ के लोगों को ऐसे पद दे रहे हैं। मुख्यमंत्री प्रदेश का होता है, किसी संगठन का नहीं। संघ के एजेंडे पर काम करने का दम भरने वाले मुख्यमंत्री यह भूल गए कि आर एस एस का हिडन एजेंडा प्रदेश के लिए घातक है। शिक्षा का भगवाकरण करने की जगह शिक्षा की गुणवत्ता पर काम किया जाए तो प्रदेश के बच्चों का भला होगा। गीता, गाय, गंगा और गायत्री की बात करने वाली भाजपा इन सब चीजों से ऊपर उठे, 14वी सदी के एजेंडा को  21वीं सदी के बच्चों पर ना थोपे। 

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