रोहतक/महम: कल्पना कीजिए… रात के 12 बजते ही पूरा गांव जैसे थम जाए।
सड़कें खाली… गांव की सीमाओं पर पहरा… कोई ग्रामीण बाहर नहीं जा सकता और किसी बाहरी व्यक्ति को अंदर आने की इजाजत नहीं।
यह किसी फिल्म का सीन नहीं, बल्कि रोहतक के महम चौबीसी क्षेत्र के खरक जाटान गांव की करीब 300 साल पुरानी बताई जाने वाली परंपरा है।
भाद्रपद महीने के शनिवार को गांव में ऐसा ही नजारा देखने को मिला। शुक्रवार रात 12 बजे से शनिवार रात 12 बजे तक गांव का आवागमन पूरी तरह रोक दिया गया।
एक पूरा दिन… गांव अपने ही दायरे में बंद रहा।
आखिर क्यों बंद हो जाता है पूरा गांव?
इस परंपरा के पीछे ग्रामीणों की एक पुरानी लोकमान्यता जुड़ी हुई है।
ग्रामीणों के अनुसार, सदियों पहले गांव में बच्चों और पशुओं के बीच बीमारी फैल गई थी। उस समय गांव में रहने वाले एक साधु ने ग्रामीणों को एक दिन के लिए गांव को बाहरी संपर्क से अलग रखने की सलाह दी थी।
ग्रामीणों का मानना है कि उस समय बीमारी के प्रसार को रोकने में इस व्यवस्था से मदद मिली।
इसके बाद से भाद्रपद महीने के शनिवार को गांव बंद रखने की परंपरा चली आ रही है।
हालांकि, इस कहानी को ग्रामीण लोकमान्यता के रूप में बताते हैं; इसकी ऐतिहासिक पुष्टि स्वतंत्र रूप से नहीं हुई है।
रात 12 बजे खिंच गई गांव की ‘सीमा’
गांव बंद होने से पहले ही मुनादी करा दी गई थी।
लोगों ने जरूरी काम पहले ही निपटा लिए। जो परिवार शहरों में रहते हैं, वे भी बंद शुरू होने से पहले गांव पहुंच गए।
फिर शुक्रवार रात 12 बजे गांव की फिरनी और सीमा के आसपास प्रतीकात्मक रेखा खींची गई।
इसके बाद शुरू हुआ 24 घंटे का बंद।
न कोई गांव से बाहर…
न कोई गांव के अंदर।
युवाओं और ग्रामीणों ने गांव की गलियों और सीमा के आसपास पहरा दिया।
इस एक दिन घरों में नहीं जला चूल्हा
इस परंपरा की सबसे दिलचस्प बात यह रही कि बंद के दौरान घरों में खाना नहीं बनाया गया।
एक दिन पहले ही भोजन तैयार कर लिया गया था।
घरों में खीर, मीठी रोटी, सुहाली और गुलगुले बनाए गए। ग्रामीणों ने इसी भोजन का सेवन किया और परंपरा के अनुसार नमकीन भोजन से परहेज रखा।
यानी गांव बंद ही नहीं हुआ…
उस दिन गांव की दिनचर्या भी बदल गई।
धूनी की आंच पर बनी खीर
शनिवार सुबह गांव में हवन और धूणी का आयोजन हुआ।
धूनी की आंच पर खीर तैयार की गई और बाद में ग्रामीणों में प्रसाद के रूप में बांटी गई।
महिलाएं सत्संग और भजन-कीर्तन में जुटीं तो बच्चे और युवा कबड्डी समेत अलग-अलग खेलों में हिस्सा लेते नजर आए।
जोगियों ने रांझा और आल्हा का गायन किया।
एक तरफ गांव की सीमाओं पर पहरा था…
तो दूसरी तरफ गांव के भीतर भजन, लोकगीत और परंपराओं की आवाजें गूंज रही थीं।
इंसानों के साथ पशुओं के लिए भी खास दिन
इस परंपरा में पशु सेवा को भी विशेष महत्व दिया गया।
ग्रामीणों के अनुसार, गांव बंद खत्म होने के बाद पशुओं को आयोजन स्थल पर लाया गया और पारंपरिक तरीके से पवित्र जल का प्रयोग किया गया।
गांव की गलियों और घरों में लोबान, गुग्गल और धूप की धूनी भी दी गई।
ग्रामीण इसे गांव और पशुधन की सुख-समृद्धि से जोड़कर देखते हैं।
बच्चों ने देखा गांव का अलग रंग
आज के दौर में जहां मोबाइल, इंटरनेट और लगातार भागती जिंदगी ने गांवों का जीवन भी बदल दिया है, वहीं इस एक दिन खरक जाटान में तस्वीर बिल्कुल अलग नजर आई।
न बाहर जाने की जल्दी…
न बाहर से आने वालों की आवाजाही…
लोग घरों और आयोजन स्थल पर एक-दूसरे के साथ समय बिताते रहे।
बच्चे खेलते रहे, महिलाएं भजन-कीर्तन करती रहीं और बुजुर्ग नई पीढ़ी को इस परंपरा की कहानी बताते रहे।
300 साल पुरानी परंपरा या गांव की सामूहिक पहचान?
वरिष्ठ भाजपा नेता शमशेर सिंह खरक और अन्य ग्रामीणों का कहना है कि बदलते समय के बावजूद गांव ने अपनी पुरानी परंपरा को बचाकर रखा है।
ग्रामीणों के लिए यह सिर्फ 24 घंटे गांव बंद रखने की रस्म नहीं है।
यह उनके लिए एक साथ आने, अपनी जड़ों को याद करने, पशु सेवा करने और अगली पीढ़ी को गांव की लोक-संस्कृति से जोड़ने का अवसर भी है।
एक दिन… जब पूरा गांव एक साथ रुक गया
आधुनिक दौर में जहां हर चीज लगातार चलती रहती है, वहीं खरक जाटान साल में एक दिन अपनी रफ्तार रोक देता है।
24 घंटे के लिए गांव बंद…
लेकिन परंपरा जिंदा।
और शायद यही वजह है कि रोहतक के इस गांव की 300 साल पुरानी बताई जाने वाली परंपरा आज भी लोगों के लिए कौतूहल और चर्चा का विषय बनी हुई है।
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