हरियाणा कांग्रेस में विधानसभा चुनाव के बाद एक बार फिर अंदरूनी खींचतान खुलकर सामने आ गई है। इस बार विवाद की वजह बना है कांग्रेस प्रभारी बीके हरिप्रसाद का वह पत्र, जिसमें विधायकों, सांसदों और वरिष्ठ नेताओं के राजनीतिक कार्यक्रमों पर सख्त नियम लागू किए गए हैं।
एक जून को जारी इस पत्र में स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि अब कोई भी नेता धरना-प्रदर्शन, प्रेस कॉन्फ्रेंस, जनसभा या राजनीतिक कार्यक्रम आयोजित करने से पहले हरियाणा प्रदेश कांग्रेस कमेटी (HPCC) से अनुमति प्राप्त करेगा। आदेश सामने आते ही पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के समर्थक नेताओं ने इस पर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं।
प्रभारी के पत्र में क्या कहा गया?
बीके हरिप्रसाद द्वारा जारी निर्देशों में तीन प्रमुख बातें शामिल हैं—
● किसी भी राजनीतिक कार्यक्रम से पहले प्रदेश कांग्रेस कार्यालय को पूर्व सूचना देना अनिवार्य होगा।
● कार्यक्रम आयोजित करने से पहले प्रदेश संगठन से लिखित मंजूरी या ‘नो ऑब्जेक्शन’ लेना होगा।
● जिला और प्रदेश स्तर के संगठनात्मक पदाधिकारियों के साथ समन्वय बनाए रखना जरूरी होगा।
कांग्रेस नेतृत्व का कहना है कि इन नियमों का उद्देश्य संगठन में अनुशासन और बेहतर तालमेल स्थापित करना है।
हुड्डा खेमे के नेताओं ने जताई नाराजगी
नए आदेश पर कांग्रेस के वरिष्ठ विधायक बीबी बत्रा और अशोक अरोड़ा ने खुलकर सवाल उठाए हैं।
बीबी बत्रा का कहना है कि हर विधानसभा क्षेत्र की परिस्थितियां अलग होती हैं। विपक्ष में रहते हुए जनता के मुद्दों पर तुरंत प्रतिक्रिया देना कई बार जरूरी होता है। ऐसे में हर छोटे-बड़े कार्यक्रम के लिए चंडीगढ़ या दिल्ली से मंजूरी लेना व्यावहारिक नहीं लगता।
वहीं वरिष्ठ विधायक अशोक अरोड़ा का मानना है कि इस तरह के निर्देशों से स्थानीय नेतृत्व की सक्रियता प्रभावित हो सकती है और जमीनी स्तर पर काम करने वाले नेताओं की भूमिका कमजोर पड़ सकती है।
प्रदेश अध्यक्ष राव नरेंद्र का पलटवार
इस पूरे विवाद के बीच हरियाणा कांग्रेस अध्यक्ष राव नरेंद्र ने संगठन के फैसले का बचाव किया है।
उन्होंने कहा कि उन्हें किसी भी विधायक की ओर से आधिकारिक विरोध की जानकारी नहीं है। राव नरेंद्र के मुताबिक प्रदेशभर से कार्यकर्ताओं के फोन आ रहे हैं और अधिकांश लोग इस निर्णय का स्वागत कर रहे हैं।
उन्होंने साफ कहा कि यह फैसला संगठन को मजबूत और अनुशासित बनाने के लिए लिया गया है। जो लोग इसका विरोध कर रहे हैं, उन्हें पार्टी हित को प्राथमिकता देनी चाहिए।
आखिर हाईकमान को क्यों उठाना पड़ा यह कदम?
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि हरियाणा कांग्रेस में लंबे समय से नेताओं की व्यक्तिगत सक्रियता और गुटबाजी संगठन के लिए चुनौती बनी हुई है।
हाल के दिनों में कई नेताओं ने अपनी अलग-अलग यात्राएं, प्रेस कॉन्फ्रेंस और कार्यक्रम आयोजित किए, जिनसे यह संदेश गया कि पार्टी के भीतर अलग-अलग राजनीतिक धड़े सक्रिय हैं।
विशेष रूप से बृजेंद्र सिंह की ‘सद्भाव यात्रा’ को भी कई राजनीतिक पर्यवेक्षकों ने व्यक्तिगत राजनीतिक सक्रियता के रूप में देखा। माना जा रहा है कि इसी पृष्ठभूमि में कांग्रेस हाईकमान ने संगठनात्मक नियंत्रण मजबूत करने का फैसला लिया है।
क्या बढ़ेगी संगठन और हुड्डा खेमे की दूरी?
फिलहाल यह विवाद शुरुआती दौर में है, लेकिन बीके हरिप्रसाद के इस आदेश ने साफ संकेत दे दिया है कि कांग्रेस नेतृत्व अब प्रदेश इकाई में अनुशासन को लेकर कोई ढील देने के मूड में नहीं है।
आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि हुड्डा खेमा इस फैसले को किस तरह स्वीकार करता है और संगठनात्मक अनुशासन तथा क्षेत्रीय नेताओं की राजनीतिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन कैसे बनाया जाता है।