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90 हलके, 7 महीने और एक बड़ा सवाल: सद्भाव यात्रा का समापन या सियासी अकेलापन? बृजेंद्र सिंह को क्या मिला, क्या खोया

सद्भाव यात्रा या शक्ति प्रदर्शन? रोहतक में फिर उजागर हुई कांग्रेस की गुटबाजीसद्भाव यात्रा या शक्ति प्रदर्शन? रोहतक में फिर उजागर हुई कांग्रेस की गुटबाजी

विशेष टिप्पणी | डॉ अनुज नरवाल रोहतकी ||अलख हरियाणा

करीब सात महीने तक हरियाणा के 90 विधानसभा क्षेत्रों में घूमने के बाद पूर्व सांसद बृजेंद्र सिंह की “सद्भाव यात्रा” रोहतक में आकर समाप्त हो गई। 5 अक्टूबर से शुरू हुई यह यात्रा राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा से प्रेरित बताई गई थी। इसका उद्देश्य भाईचारे को मजबूत करना, कांग्रेस कार्यकर्ताओं को सक्रिय करना और संगठन में नई ऊर्जा भरना था।

यात्रा के समर्थक इसे कांग्रेस के पुनर्जागरण की शुरुआत बता रहे हैं, लेकिन इसके समापन ने जितने सवालों के जवाब दिए, उससे कहीं ज्यादा नए सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि यह यात्रा वास्तव में कांग्रेस को मजबूत करने और सभी कार्यकर्ताओं को जोड़ने के लिए थी, तो रोहतक में इसके समापन पर कांग्रेस का सबसे प्रभावशाली हुड्डा खेमा लगभग पूरी तरह गायब क्यों रहा?

रोहतक सिर्फ एक जिला नहीं, बल्कि हरियाणा कांग्रेस की राजनीति का केंद्र माना जाता है। जिले के विधायक, सांसद और जिलाध्यक्ष तक यात्रा में दिखाई नहीं दिए। ऐसे में यह दावा करना कठिन हो जाता है कि कांग्रेस पूरी तरह एकजुट है।

यात्रा सफल रही या राजनीतिक संदेश अधूरा रह गया?

बृजेंद्र सिंह ने इस यात्रा के माध्यम से प्रदेश के हर कोने तक पहुंचने की कोशिश की। गांव-गांव और शहर-शहर जाकर उन्होंने कार्यकर्ताओं से संवाद किया, भाजपा सरकार की नीतियों पर सवाल उठाए और कांग्रेस को फिर से सक्रिय करने का संदेश दिया।

यात्रा में शामिल कार्यकर्ताओं का दावा है कि इससे कांग्रेस में नई जान आई है। कार्यकर्ता इसे कांग्रेस के लिए मील का पत्थर बता रहे हैं, चुनावी हार के बाद निराश कार्यकर्ताओं के लिए “संजीवनी” मानते हैं।

इन दावों को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। यह सच है कि लंबे समय बाद कांग्रेस के एक नेता ने पूरे प्रदेश को कवर करने वाला राजनीतिक अभियान चलाया। इससे कार्यकर्ताओं में चर्चा हुई, संगठन में हलचल पैदा हुई और बृजेंद्र सिंह का राजनीतिक प्रोफाइल भी मजबूत हुआ।

लेकिन राजनीति में केवल भीड़ और चर्चाएं ही सफलता का पैमाना नहीं होतीं। असली सवाल यह होता है कि क्या नेता अपने संगठन को साथ लेकर चल पाया?

समापन समारोह ने खड़े कर दिए बड़े सवाल

90 विधानसभा क्षेत्रों की यात्रा पूरी करने के बाद जब अंतिम तस्वीर सामने आई तो उसमें बृजेंद्र सिंह के साथ कार्यकर्ता तो दिखाई दिए, लेकिन कांग्रेस का प्रभावशाली हुड्डा खेमा नहीं दिखा।

यह अनुपस्थिति केवल एक कार्यक्रम से दूरी नहीं थी, बल्कि एक राजनीतिक संदेश भी थी। क्योंकि रोहतक वही क्षेत्र है जहां से भूपेंद्र सिंह हुड्डा की राजनीति का सबसे मजबूत आधार माना जाता है। अगर सद्भाव यात्रा का उद्देश्य कांग्रेस में सद्भाव और एकजुटता स्थापित करना था, तो उसके समापन समारोह में ही पार्टी का एक बड़ा धड़ा नदारद क्यों रहा? यही सवाल इस पूरी यात्रा की राजनीतिक सफलता पर प्रश्नचिह्न लगा देता है।

क्या यह सद्भाव यात्रा थी या शक्ति प्रदर्शन?

राजनीतिक गलियारों में शुरू से ही यह चर्चा रही कि सद्भाव यात्रा केवल सामाजिक भाईचारे का अभियान नहीं बल्कि बृजेंद्र सिंह की राजनीतिक ताकत दिखाने का भी माध्यम है। यात्रा के दौरान कई ऐसे चेहरे उनके साथ दिखाई दिए जो लंबे समय से कांग्रेस की मुख्यधारा से दूर थे। इससे यह संदेश जरूर गया कि बृजेंद्र सिंह अपने समर्थकों का एक अलग आधार तैयार कर रहे हैं। लेकिन दूसरी तरफ यह भी साफ दिखाई दिया कि कांग्रेस के स्थापित नेतृत्व का बड़ा हिस्सा इस अभियान से दूरी बनाए रहा। यानी यात्रा ने बृजेंद्र सिंह की मौजूदगी तो दर्ज कराई, लेकिन उन्हें कांग्रेस के सर्वमान्य प्रदेशव्यापी नेता के रूप में स्थापित नहीं कर सकी।

बृजेंद्र सिंह ने क्या पाया?

1. प्रदेश स्तर की पहचान मजबूत हुई

जींद और हिसार क्षेत्र की राजनीति तक सीमित माने जाने वाले बृजेंद्र सिंह ने इस यात्रा के माध्यम से पूरे हरियाणा में अपनी राजनीतिक उपस्थिति दर्ज कराई। अब उन्हें केवल एक पूर्व सांसद या क्षेत्रीय नेता के रूप में नहीं देखा जा सकता।

2. कार्यकर्ताओं के बीच सक्रिय छवि बनी

चुनावी हार के बाद कांग्रेस कार्यकर्ताओं में जो निराशा थी, उस माहौल में लगातार सात महीने तक यात्रा निकालना अपने आप में एक राजनीतिक संदेश था। इससे कार्यकर्ताओं को यह संकेत मिला कि पार्टी में अभी भी कुछ नेता मैदान में सक्रिय हैं।

3. स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बनाई

यात्रा ने यह साबित किया कि बृजेंद्र सिंह केवल किसी गुट की राजनीति तक सीमित नहीं रहना चाहते। उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाने और प्रदेश स्तरीय भूमिका निभाने का प्रयास किया है।

4. कांग्रेस हाईकमान तक संदेश पहुंचाया

90 विधानसभा क्षेत्रों की यात्रा कोई छोटी राजनीतिक कवायद नहीं होती। इससे कांग्रेस नेतृत्व को भी यह संदेश गया कि बृजेंद्र सिंह संगठन के लिए काम करने और लंबी राजनीतिक दौड़ में बने रहने की क्षमता रखते हैं।

बृजेंद्र सिंह ने क्या खोया?

1. कांग्रेस की एकजुटता का दावा कमजोर हुआ

यात्रा का उद्देश्य सद्भाव स्थापित करना था, लेकिन समापन समारोह में पार्टी का सबसे बड़ा गुट अनुपस्थित रहा। इससे यात्रा के मूल संदेश पर ही सवाल खड़े हो गए।

2. शक्ति प्रदर्शन की सीमाएं उजागर हुईं

कार्यकर्ताओं की मौजूदगी और जनसंपर्क अभियान अपनी जगह महत्वपूर्ण हैं, लेकिन कांग्रेस के बड़े नेताओं की गैरमौजूदगी ने यह संकेत भी दिया कि संगठन के शीर्ष स्तर पर बृजेंद्र सिंह की स्वीकार्यता अभी सीमित है।

3. नेतृत्व की दावेदारी पर प्रश्न बरकरार

यात्रा के बाद उनकी पहचान और सक्रियता जरूर बढ़ी है, लेकिन क्या वे हरियाणा कांग्रेस में वैकल्पिक शक्ति केंद्र बन पाए हैं? इसका स्पष्ट जवाब अभी नहीं मिला है। प्रदेश की राजनीति में भूपेंद्र सिंह हुड्डा का प्रभाव आज भी निर्णायक बना हुआ है।

4. राजनीतिक निवेश का लाभ अभी अनिश्चित

इतनी लंबी यात्रा के बाद सामान्य तौर पर किसी नेता को संगठनात्मक जिम्मेदारी, राजनीतिक विस्तार या स्पष्ट समर्थन के रूप में लाभ मिलता है। फिलहाल ऐसा कोई बड़ा राजनीतिक परिणाम सामने नहीं आया है। इसलिए यात्रा का वास्तविक लाभ भविष्य की राजनीति ही तय करेगी।

कांग्रेस के लिए भी चेतावनी

यह यात्रा केवल बृजेंद्र सिंह का राजनीतिक अभियान नहीं थी, बल्कि हरियाणा कांग्रेस की मौजूदा स्थिति का आईना भी थी। एक तरफ कार्यकर्ता बदलाव और सक्रिय राजनीति की उम्मीद कर रहे हैं, दूसरी तरफ शीर्ष नेतृत्व के विभिन्न गुटों के बीच दूरी अभी भी खत्म होती नजर नहीं आती।

यदि कांग्रेस को भविष्य में भाजपा के मुकाबले मजबूत विकल्प बनना है तो उसे सिर्फ यात्राओं और सभाओं से आगे बढ़कर संगठनात्मक एकता स्थापित करनी होगी।

बृजेंद्र सिंह की सद्भाव यात्रा को पूरी तरह असफल कहना गलत होगा। इस यात्रा ने उन्हें प्रदेश स्तर की पहचान दी, कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा पैदा की और उन्हें हरियाणा कांग्रेस की राजनीति में एक गंभीर दावेदार के रूप में स्थापित किया।

लेकिन यह भी उतना ही सच है कि यात्रा अपने सबसे बड़े राजनीतिक उद्देश्य—कांग्रेस के भीतर व्यापक एकजुटता दिखाने—में पूरी तरह सफल नजर नहीं आई।

इसलिए कहा जा सकता है कि बृजेंद्र सिंह ने इस यात्रा से राजनीतिक पहचान और कार्यकर्ताओं का भरोसा जरूर पाया, लेकिन पार्टी के भीतर सर्वस्वीकार्यता और व्यापक नेतृत्व समर्थन हासिल नहीं कर पाए।

90 हलकों की यात्रा समाप्त हो गई है, मगर असली सवाल अभी बाकी है—

क्या यह यात्रा बृजेंद्र सिंह को हरियाणा कांग्रेस की अगली पंक्ति का नेता बनाएगी, या फिर यह एक महत्वाकांक्षी राजनीतिक अभियान बनकर इतिहास के पन्नों में दर्ज होकर रह जाएगी?

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